क्या लिखूं उन पर: Sakshi Mishra

क्या लिखूं उन पर 
सुबह आपने पकड़कर हाथ 
       किया इशारा
  लिखो कुछ माँ पर
  मैंने भी पलकें बांधकर
       दिया विश्वास
       क्या लिखूं उनपर
  जिनके आगे कैसा भी प्रेम
       फीका है।।
  जिनकी सुषमा किसी भी
       चमक से ज्यादा है
 मेरी भी माँ कुछ ऐसी है
 उस आदि अनंत की तरह
      जो छिपाये है मुझे
 बिना किसी निमित्त अपने
      कोने में
 मुझे ही मेरे भावी चाह
      का पता नहीं
 पर, उनकी कलेवर आवाज
      देती है ‘उम्मीद’
 यूं किसी की भी उम्मीद
       से ज्यादा है
न जाने क्यूँ परेशान 
      रहती हैं 
मेरी कलम यूं हैरान
       रहती है
उनका फुर्तिलापन मानो
    मुझे उम्रदराज़
    बना गया
    कहती हैं चिल्लाकर
 

दो कौड़ी में ले जायेगा कोई
    भी तुम्हें
 सुनती हूँ हँसकर
मानो और सजग कर गयीं न
  इस बार भी
मेरी नही, हर माँ ऐसी हैं
जिनके प्रेम में डूबा संसार ऐसा है
  क्षणिक नहीं
शाश्वत का साकार ऐसा है
लिखने का कभी खयाल
   

नहीं आया
क्यूंकि आभा से उनकी हर कोई
    तृप्त है
कलम क्या कर पाएंगे
   अशेष त्वरित
क्या लिखूं उन पर 
साक्षी मिश्रा
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश

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