दुराचार को मिटाने के लिए सामूहिक प्रयास की जरूरत। – एस भारतीय।

दुराचार को मिटाने के लिए सामूहिक प्रयास की जरूरत। – एस भारतीय।
महिलाओं और युवतियों पर कहीं एसिड अटैक हो रहे हैं, तो कहीं निरंतर हत्याएं-बलात्कार हो रहे और कहीं दहेज उत्पीड़न की घटनाएं हो रही हैं। इन घटनाओं पर कभी- कभार शोर भी होता है तो लोग विरोध भी प्रकट करते हैं, मीडिया सक्रिय होती है पर अपराध कम होने की बजाय बढ़ ही रहे हैं। एक ओर भारतीय नेतृत्व में इच्छाशक्ति तो बढ़ी है लेकिन विडम्बना यह है कि आम नागरिक महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को लेकर स्वाभाव से ही पुरुष वर्चस्व के पक्षधर और सामंती मनःस्थिति के कायल हैं।
हमारे देश-समाज में स्त्रियों का यौन उत्पीड़न लगातार जारी है लेकिन यह बिडम्बना ही कही जायेगी कि सरकार, प्रशासन, न्यायालय, समाज और सामाजिक संस्थाओं के साथ मीडिया भी इस कुकृत्य में कमी लाने में सफल नहीं हो पायी है। देश के हर कोने से महिलाओं के साथ दुष्कर्म,छेड़छाड़, यौन प्रताड़ना, दहेज के लिये जलाया जाना, शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना और स्त्रियों की खरीद-फरोख्त के समाचार सुनने को मिलते रहते हैं। साथ ही छोटे से बड़े हर स्तर पर असमानता और भेदभाव के कारण इसमें गिरावट के चिन्ह कभी नहीं देखे गए।
देश में लोगों को महिलाओं के अधिकारों के बारे में पूरी जानकारी नहीं है और इसका पालन पूरी गंभीरता और इच्छाशक्ति से नहीं होता है। महिला सशक्तिकरण के तमाम दावों के बाद भी महिलाएँ अपने असल अधिकार से कोसों दूर हैं।निःसंदेह बलात्कार एक राष्ट्रीय कोढ़ जैसी समस्या है और इस समस्या के कारण देश की महिलाओं,किशोरियों,युवतियों यहां तक की तीन चार वर्ष की बच्चियों के साथ दुराचार हो जाते हैं जिससे राज्य ही नहीं पूरे देश को शर्मसार होना पड़ता है।
बलात्कार की लेकर एक बड़ा सवाल निकलकर आता है कि ऐसा क्यों हो रहा है?आजादी के इतने सालों बाद भी हमारी महिलाएं सुरक्षित क्यों नहीं हैं?
विगत वर्षो से देश के आंदोलन, घोटाले आदि चिंता का विषय बने हुए हैं।अगर किसी नेता ने देश का काला धन देश में वापस लाने का आवाहन किया तो मानो वही देश की सारी समस्या हो गए।राष्ट्रीय मीडिया में उन्हीं को मुद्दा बनाया जाता है।राजनेताओं की गलियों से लेकर फिल्मी दुनिया तक एक एक अपडेट मीडिया के लिए चिंता का विषय होगा।लेकिन देश में हो रहे चलती बस में गैंगरेप जैसी घटनाओं पर बहस क्यों नहीं?गैंगरेप,बलात्कार,महिला उत्पीड़न आदि घटनाओं को रोकने का प्रयास कौन करेगा?विगत वर्षो से बलात्कार जैसी कई बड़ी वारदातें हुई।जिन पर पीड़िताओं को न्याय मिलने में देरी हुई।कई ऐसी घटनाएं हुई जिनमें रेप होने के बाद पीड़िता न्याय के लिए दर दर भटकती रही।और आरोपी खुलेआम घूमता रहा और तो और कई बार पीड़िता और उसके परिवार पर जानलेवा हमला भी किया जिसके बाद पीड़िता अपनी जान बचाने के लिए न्याय की गुहार लगाती रही जिससे उसकी सुरक्षा हो सकती थी लेकिन पुलिस व संबंधित जांच टीम के द्वारा उन्हें सुरक्षा नहीं मिली और अंत में आरोपी द्वारा पीड़िता व उसके परिवार मौत के घाट उतार दिया जाता है।ऐसी तमाम घटनाएं आपको अपने आस पड़ोस में देखने को मिल जाएंगी।फिर भी हमारा पुरुष प्रधान समाज शांत है।क्या देश में बलात्कार होना बंद हो गए?क्या देश में महामारी,भूख,गरीबी अशिक्षा,कुपोषण,भ्रष्टाचार जैसी अनेकों समस्याएं नहीं है?
ऐसे कई बड़े सवाल उठते हैं लेकिन राष्ट्रीय मीडिया इन मुद्दों पर चर्चा नहीं करना चाहती।पिछड़े ग्रामीण इलाकों में बलात्कार जैसी बड़ी वारदातें हो जाती हैं जो वहीं पंचायतों द्वारा दफन कर दिया जाता है।ऐसी खबरें राष्ट्रीय मीडिया की पट्टियों में भी नहीं पहुंच पाती।
लोग आज भी आजादी के पहले जैसी जिंदगी जीने की मजबूर हैं।बलात्कार की समस्या को समग्रता से समझने की जरूरत है।हमारी बहुत सी समस्याएं ऐसी है जो दिखने में शारीरिक लगती हैं पर होती मानसिक हैं।जैसे बलात्कार।
बलात्कार तन से पहले मन की बीमारी है।इस समस्या पर दोराय चर्चाओं के बजाए गहन मंथन करने की जरूरत है। एक आंकड़ा के अनुसार हमारे देश में केवल चार प्रतिशत बलात्कार के मामले ही अनजान व्यक्ति द्वारा किए जाते हैं तथा 96 प्रतिशत बलात्कार जानने पहचानने वाले लोगो द्वारा किए जाते हैं।अब देखना यह होगा की इसमें और लोगो का क्या नजरिया है।बलात्कार के लिए किसी एक व्यक्ति,महिला,या पुरुष, जाति,वर्ग,वर्ण आदि को एकतरफा दोषी कहना उचित नहीं होगा।इसके लिए लचर कानून व हमारी सामाजिक व्यवस्था दोषी है।इस अभिशाप रूपी दोष को जड़ से मिटाने के लिए सर्व समाज को एकत्रित होकर मानवता पर लगे इस दाग को हटाया जा सकता है।

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