Allahabad University News: गांधी की नई तालीम निर्भय बनाती है : प्रो. संतोष भदौरिया

प्रयागराज: इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गांधी मंडपम में ‘ गांधी की नई तालीम और 21 वीं सदी’ विषय पर विशेष व्याख्यान हुआ। विशिष्ट वक्ता के तौर पर प्रसिद्ध गांधीवादी शिक्षक प्रो. पी. के साहू ने गांधी की नई तालीम पर विस्तार से बात की। कार्यक्रम की अध्यक्षता अर्थशास्त्री प्रो. पी. के घोष ने की।स्वागत वक्तव्य गांधी विचार एवं शांति अध्ययन संस्थान के निदेशक प्रो. संतोष भदौरिया ने किया।  संचालन हिंदी विभाग की शिक्षिका डॉ. अमृता ने किया। इस व्याख्यान के अवसर पर आमंत्रित अतिथियों ने निदेशक के साथ पौधारोपण भी किया, प्रो. पी. के साहू ने अपने व्याख्यान में कहा कि गांधी जी शिक्षा दर्शन ऐसा था

जिसमें अंत:करण की शुद्धता पर जोर था। उन्होंने कहा कि आंतरिक विकास को समुदाय, समाज और देश से जब तक नहीं जोड़ा जायेगा वह स्वार्थी विकास ही होगा। गांधी जी विज्ञान, अंग्रेजी, गणित के विरोधी नहीं थे, लेकिन उनका स्पष्ट मानना था कि शिक्षा से हासिल मानसिक और ज्ञानात्मक विकास को आंतरिक और आध्यात्मिक विकास से जोड़ना चाहिए। नई तालीम में क्या सीखे के बजाय कैसे सीखने पर जोर था। आत्मशक्ति का जागरण जरूरी है। आंतरिक अनुभव को समझने की जरूरत है। गांधी जी ने गुजरात विद्यापीठ की स्थापना इसीलिए कि शिक्षा का वास्तविक अर्थ जाना जा सके,

प्राथमिक शिक्षा में घर की भाषा और बोली को स्थान दिया जाय। मातृभाषा पर अधिक जोर दिया जाय। निर्माणात्मक और रचनात्मक शिक्षा को केंद्र में रखा जाय। समावेशी शिक्षा पर ध्यान दिया जाय। आत्मशक्ति के जागरण के लिए विविध अनुभवों से गुजरना होगा।अच्छी शिक्षा तभी हासिल होगी जब शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों निर्भय होंगे। आश्रित होने से मुक्त होना होगा। ऐसी शिक्षा जहां सभी शिक्षार्थी आज़ाद महसूस करें। ऐसी शिक्षा जो नैतिकता को बढ़ावा दे। दैनिक जीवन की आवश्यकता से पाठ्यचर्या से जोड़ना होगा। स्वावलंबी शैक्षिक संस्थानों का निर्माण करना होगा,

किसी भी समाज का स्वतंत्रता के लिए दूसरे पर आश्रित होना स्वंतत्रता को नष्ट करना है। नवउदारवादी शिक्षा व्यवस्था इस मामले में गांधी की नई तालीम से ठीक उलट है क्योंकि गांधी की नई तालीम में स्वतंत्रता का स्व सुरक्षित और प्रभावी है। 21 वीं सदी में गांधीयन विचारधारा ही नव उदारवादी व्यवस्था की जगह ले सकती है। गांधी की नई तालीम में सशक्तिकरण की बात है। अहिंसा के विकास की बात है। शिक्षक और शिक्षार्थी में आदेश और अनुपालन का नहीं बल्कि परस्परता से है। दोनों एक दूसरे को प्रेरित और प्रभावित करें। चारित्रिक विकास को कौशल विकास से जोड़ना

निरंतरता से जुड़ा मामला है, कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. पी. के घोष ने अपने वक्तव्य में शिक्षा के व्यवहारिक रूप को आत्मसात करने की बात की। उन्होंने उस शिक्षक को याद किया जो ओआरएस घोल के जनक थे। उन्होंने शिक्षा को जीवनोपयोगी और समाजपरक बनाने की बात की, स्वागत वक्तव्य देते हुए संस्थान के निदेशक प्रो.संतोष भदौरिया ने कहा कि आज का दिन आत्ममंथन और आत्मालोचन का दिन है।गांधी की नई तालीम व्यक्ति और समाज को निर्भय बनाती है।चरित्र निर्माण उनकी नई तालीम के केंद्र में है,

जो आज के उपभोक्तावादी संस्कृति के दौर में और भी प्रासंगिक है, इस अवसर पर प्रो. सालेहा रसीद, प्रो. एस.पी शुक्ला, प्रवीण शेखर, अमितेश कुमार, राजेश सिंह, डॉ. धीरेंद्र धवल, राहुल कुमार,प्रतिमा,दिव्या,अतुल,अभिषेक,हर्ष, करन, सत्यम, सृष्टि, पुष्कर, निशांत तथा राजभाषा अनुभाग से हरिओम कुमार सहित तमाम विद्यार्थी और गांधी संस्थान के कर्मचारी मौजूद रहें।

रिपोर्ट अमन दीप सचान

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