Writter Viswa Sachan
दिन-दिन भर बेचैन रहते हैं,रात-रात भर जगते हैं।
कैसे बताएं तुम्हारे लिए,हम क्या-क्या नहीं करते हैं।।…(१)
कभी शायरी,कभी कविता,कभी कहानीं लिखते हैं।
हम तुम्हारी चाहत में,कभी ताजा तो कभी तूफानीं लिखते हैं।।……(२)
तुम स्वर्ग की परी हो,तुम मेरी माधुरी हो।
तुम्हारी तारीफ में हम,मनमानी लिखते हैं।।
तुम्हारे नाम हम अपनीं,सारी जवानी लिखते हैं।।।.….(३)
खरीदार नहीं है यूँ तो मेरा,कोई भरे जमानें में।
हम कोहिनूर हीरे हैं,मगर तेरी चाहत की बाजार में,हम होकर पानी-पानी बिकते हैं।।…..(४)
फूलों में बैठी तितली है तू,आसमां में चमकती बिजली है तू।
पुष्प बनकर हम,तेरे हर कदम में बिखरते हैं।।
तेरे आशियानों में हम,शबनम बनकर बरसते हैं।।।….(५)
तेरी उल्फत की गलियों में हम,हदें पार करके गुजरते हैं।
मौत से भय नहीं हमको,हम तेरी जुदाई से डरते हैं।।…(६)
सिर्फ चेहरा नहीं,जिन्दगी का हर पल साफ-साफ दिखता है।
तेरे नैन मुझे दर्पण लगते हैं।।
आज से और अभी से ओ मेरी दिलरुबा,हम अपना सर्वस्य तुझे अर्पण करते हैं।
तुनीर में बाण हैं मेरे,मगर तेरी नजरों के वार से आहत होकर,हम आत्मसमर्पण करते हैं।।….(७)
दिन-दिन भर बेचैन रहते हैं,रात-रात भर जगते हैं।
कैसे बतायें तुम्हारे लिए,हम क्या-क्या नहीं करते हैं।।
– कवि विश्वा सचान

