रिपोर्ट अमन दीप सचान,प्रधान संपादक इंडिपेंडेंट इंडिया मीडिया ग्रुप
देश का चौथा स्तंभ स्वयं ही कटघरे में – ए.पी. सिंह
फतेहपुर
पत्रकारिता में नाक के नीचे आंधी आई हुई है, फर्जी और दागी मूंछ काटने पर उतारू हैं। पत्रकारिता की साख दांव पर लग चुकी है। समाज का भरोसा उठता जा रहा है। हैरत की बात यही है कि मीडिया की स्वतंत्रता के नाम पर सब बगुले भगत की तरह चुप्पी साधे बैठे हैं। सरकार सोशल मीडिया के लिए कायदे-कानून बनाने में जुटी है लेकिन ना तो मीडिया संस्थानों ने कायदे-कानून बनाए और ना ही भारतीय प्रेस परिषद ने कागजी काम के अलावा पत्रकारिता को साफ सुधरा बनाए रखने के लिए कोई पहल की। नतीजे समाज के लिए बेहद घातक हैं।
कुछ संस्थान तो ऐसे लोग संचालित कर रहे है जिन पर न जाने कितने अपराधिक मुक़दमे भी दर्ज हैं पर पत्रकारिता के नाम का लेबल लगाकर ऐसी धौंस जमाते है की लोकतंत्र का यह चौथा स्तम्भ स्वंय ही कटघरे में नज़र आने लगता है।
डिजिटल मीडिया के इस दौर में पत्रकार बनना बहुत ही आसान हो गया है। डिजिटल पत्रकारिता के इस युग में ऐसे ऐसे संवाददाता देखने को मिल रहे हैं ऐसे ऐसे सम्पादकों की बाढ़ है जिन्हें ढंग से अपना नाम तक लिखना नही आता। पत्रकारिता शब्द को अंग्रेज़ी में लिखने को बोल दो तो शायद ही उन्हें सही उच्चारण मालूम हो भले ही अपने आप को पत्रकार बोलते हो पर जब अपना नाम तक लिखने का ढंग नही है तो उन्होंने कभी कोई लेख क्या लिखा होगा पर उनके ठाठ देख उनपर सवाल उठाने वाले भी सहम जाए। खोजी पत्रकार जिनका सही मायने में उद्देश्य महत्वपूर्ण समाचारों को दुनिया के सामने लाना होता है वह इन पत्रकारों के सामने कहीं नही ठहरते।
पत्रकारों की यह प्रजाति अपना टारगेट बनाने के लिए पहले उसके खिलाफ गोल मोल खबरें प्रकाशित करते हैं। जिससे टारगेट उनके कदमों में गिर पड़ता है। फिर लम्बे समय तक वह दुधारू गाय बना रहता है। जबकि ऐसे लोगों का दूर-दूर तक पत्रकारिता क्षेत्र से कोई लेना देना नहीं है जो अपना लिखा हुआ खुद नहीं पढ सकते है तो वह पत्रकारिता कैसे कर सकते है यह एक विचारणीय प्रश्न है।
बात बात पर पुलिस की कार्यप्रणाली पर उंगली उठाने वाले इन तथाकथित पत्रकारों की कार्यप्रणाली पर उंगली उठाने की ज़रूरत पुलिस के आला अधिकारियों को है।इस मामले मे पुलिस के उच्चधिकारियो को संज्ञान लेते हुए ऐसे ब्लेकमेलर पत्रकारों पर लगाम कसने की ज़रूरत है। ताकि लोकतंत्र के चौथा स्तम्भ का दुरुपयोग कर अपनी दुकान चलाने वालों पर लगाम लग सके।
जिले में इस समय फर्जी पत्रकारों की बाढ़ आई हुई है,कुछ संस्थाए ऐसी है जो 1000 रूपये से लेकर 5000 हजार रूपये जमा करवाकर अपने संस्थान का कार्ड बना देती है और बेरोजगार युवकों को गुमराह कर उन्हें वसूली करने पर उकसाती हैं। लेकिन पकडे जाने पर वो संस्थायें अपने हाथ खड़े कर लेती हैं। लगातार बढ़ती फर्जी पत्रकारों की संख्या से न सिर्फ विभिन्न विभागों के ज़िम्मेदार अधिकारी परेशान हैं बल्कि खुद सम्मानित पत्रकार भी अपमानित महसूस करते है।।

