प्राइवेट स्कूल की तरह बना बाबूपुर का प्राथमिक विद्यालय।
सरकारी स्कूल का नाम सुनते ही लोगों के मन में एक छवि बन जाती है कि वह न तो अध्यापक रोज आते हैं और ना ही पढ़ाई होती है। लेकिन फतेहपुर जनपद के अमौली ब्लाक का एक ऐसा प्राथमिक विद्यालय है जहां पर सिर्फ शिक्षा ही नहीं विद्यालय परिसर पर रोड और पत्थरीकरण भी किया गया है। जिससे स्कूल की सुंदरता में चार चांद लग गए।
अमौली विकासखंड क्षेत्र के प्राथमिक विद्यालय बाबूपुर का यह स्कूल इस बात को नकारता है कि सरकारी स्कूलों में टीचर नहीं आते और ना ही बच्चों को शिक्षा दी जाती है। विद्यालय की रंग बिरंगी दीवारे जिन पर कविताएं और पहाड़े लिखे हुए हैं वहीं दूसरी तरफ कक्षाओं में व्यवस्थित रूप से बैठकर पढ़ते हुए बच्चों को देखकर हर किसी को लगता है कि यह एक प्राइवेट स्कूल है लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। प्राइवेट स्कूलों की भांति दिखने वाले इस सरकारी स्कूल में वर्तमान समय में करुणा वैश्विक महामारी कालका दौरान चल रहा है जिससे बच्चों की शिक्षा बाधित है और बच्चे स्कूल नहीं बुलाए जाते। इसके बाद भी स्कूल परिसर की सुंदरता पर कोई प्रभाव हुआ बदलाव देखने को नहीं मिला।
उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद के अनुसार प्रदेश में लगभग एक लाख ग्यारह हजार पांच सौ प्राथमिक विद्यालय व अड़तालिस हजार आठ सौ उच्च प्राथमिक विद्यालय संचालित है। अगर इन स्कूलों में भी ऐसी सुविधाएं हो जाएं तो कोई भी बच्चा निजी विद्यालयों में लंबी फीस देकर पढ़ने के लिए नहीं जाएगा। लेकिन ज्यादातर सरकारी स्कूलों की हालत बदतर है ऐसे में यही स्कूल कम संसाधनों में अच्छा रिजल्ट दे रहे हैं। बाबूपुर स्कूल परिसर में बच्चों के मन में प्रभाव डालने के लिए सुंदर पुष्प व वृक्षों के पौधे लगाए गए हैं। स्कूल प्रांगण में बच्चों के लिए स्वच्छ पेयजल व्यवस्था के इंतजाम भी किए गए हैं जिसमें समर्सिबल पंप व हैंडपंप की सुविधा दी गई है। बालक और बालिकाओं के लिए अलग-अलग स्वच्छ व सुंदर शौचालयों की व्यवस्था की गई है। बच्चों को खेल के साथ कुछ जानकारियां भी मिले इसके लिए एक हैप्पीनेस क्लास का भी निर्माण विद्यालय परिसर में किया गया।
स्कूल के प्रधानाध्यापक सर्वेश अवस्थी बताते हैं कि उन्होंने 2016 में जब स्कूल जॉइन किया था तो मुश्किल से 18 से 20 बच्चे स्कूल में शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते थे। उसके बाद उन्होंने व सहायक अध्यापकों के सहयोग से सोचा कि पहले स्कूल में बच्चों को लाना होगा जिससे स्कूल स्कूल लगने लगे। इसके बाद जब बच्चों को स्कूल में दाखिला करवाने के लिए गांव में जाना शुरू किया तो वहां अभिभावकों के दिमाग में प्राइवेट स्कूलों ने घर कर रखा था। उन्हें लगता था कि प्राइवेट स्कूलों में उनके बच्चे पढ़ कर अच्छा परिणाम ला सकेंगे। इसके बाद प्रधानाध्यापक ने है बच्चों को स्कूल में दाखिला करवाने के लिए स्कूल की रूपरेखा बदलने पर ध्यान दिया।प्रधानाध्यापक बताते हैं कि उन्होंने अपने सहायक अध्यापकों के सहयोग से हर महीने अपने वेतन के कुछ अंश को इकट्ठा करके स्कूल के सुंदरीकरण में लगाना शुरू किया। धीरे धीरे उनकी इस पहल में है गांव के लोग भी जुड़ने लगे। इन सभी के सहयोग से गांव में एक ऐसे विद्यालय की रूपरेखा बनी की देखने में हूबहू किसी कॉन्वेंट स्कूल से कम नहीं दिखता।
प्रधानाध्यापक ने बताया कि क्षेत्र में जब से प्राथमिक विद्यालय बाबूपुर की चर्चा हुई है तो बच्चों के अभिभावक निजी स्कूलों से नाम हटवा कर इसी स्कूल में दाखिला दिला रहे हैं। क्षेत्र के लगभग दस या ग्यारह गांवों के बच्चे दस से पंद्रह किलोमीटर की दूरी तय कर किराए के रिक्शे से स्कूल में पढ़ने के लिए आते हैं।
डेस्क पर बैठने से बच्चों में आएगा आत्मविश्वास।
सरकारी स्कूलों में ज्यादातर बच्चों के बैठने के लिए टाट पट्टियों का ही बजट है। ऐसे में स्कूल में अध्यापकों के सहयोग से डेस्क लगवाने की भी व्यवस्था करने पर चर्चा चल रही है।प्रधानाध्यापक ने कहा कि जिससे बच्चों के मन में एक उत्साह जागेगी की उन्हें भी दूसरे बच्चों की तरह सीटों पर बैठकर पढ़ने को मिलेगा।
पढ़ाई में तकनीकी उपकरणों की भी ली जाएगी मदद।
प्रधानाध्यापक सर्वेश अवस्थी ने बताया कि हमारी आगे की रणनीति है कि हम पढ़ाई के लिए बच्चों को तकनीकी उपकरण दिलाएंगे जिससे उनका रुझान पढ़ाई पर बढ़ सकेगा और वह रोज स्कूल पढ़ने आएंगे। उन्होंने बताया कि प्राथमिक विद्यालय बाबूपुर के कई बच्चों का जवाहर नवोदय विद्यालय की प्रवेश परीक्षा में भी चयन हो चुका है। प्राथमिक विद्यालय बाबूपुर में प्रधानाध्यापक सर्वेश अवस्थी समेत रविकांत गुप्ता सहायक अध्यापक, सुभद्रा शिक्षामित्र व सत्येंद्र कुमार शिक्षामित्र सभी अध्यापक मौजूद मिले।







