▪️युवा पीढ़ी गाँधी को समग्रता में समझे: प्रो. संतोष भदौरिया
प्रयागराज: गाँधी विचार एवं शांति अध्ययन संस्थान, इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा गाँधी जी की पुण्यतिथि मनाई गई। गाँधी विचार एवं शांति अध्ययन संस्थान में स्थापित गाँधी जी की प्रतिमा पर विशिष्ट अतिथि प्रो. मनमोहन कृष्ण जी ने माल्यार्पण किया तथा वृक्षारोपण भी किया गया।
विशिष्ट अतिथि ने गाँधी मंडपम में रंगोली बनाने वाली इलाहाबाद विश्वविद्यालय की दो छात्राओं दिव्या और अनामिका को गाँधी जी के जीवन पर आधारित पुस्तकें भी भेंट की। इस दौरान संस्थान के निदेशक प्रो. संतोष भदौरिया, प्रो. धनंजय यादव, प्रो. एन. बी सिंह, प्रो. अजय जेटली, प्रो. शबनम हमीद, डॉ. अविनाश श्रीवास्तव, डॉ. राजेश सिंह, डॉ. अखिलेश पाल, डॉ. धीरेंद्र प्रताप सिंह ‘धवल’, डॉ. मृत्युंजय राव परमार सहित संस्थान के सभी कर्मचारी मौजूद रहे, इस अवसर पर संस्थान द्वारा गूगल मीट पर एक ऑनलाइन व्याख्यान भी आयोजित किया।
जिसमें स्वागत वक्तव्य प्रो. संतोष भदौरिया ने दिया। उद्घाटन वक्तव्य देते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. संगीता श्रीवास्तव ने कहा कि दक्षिण अफ़्रीका में गाँधी का व्यक्तिगत तिरस्कार सामाजिक संघर्ष बन गया था। गाँधी जी सदैव कालजयी व्यक्तित्व के रुप में जाने जाते रहेंगे। उन्होंने कहा कि गाँधी के सर्वोदय, सेवा, स्वदेशी और स्वच्छता के विचारों की निरंतरता ही आज़ादी के वास्तविक अर्थ को साकार करता रहेगा। अंतिम जन के लिए और अंतिम जन को भी अहिंसा,
अनुशासन और आत्मनिर्भरता को स्वीकार करना होगा, मुख्य वक्ता के तौर पर दिल्ली से प्रो. सुधीर चंद्रा ने ‘गाँधी की भारत संकल्पना’ विषय पर बड़ी ही बेबाकी से अपनी बात रखी। प्रो. सुधीर चंद्रा ने कहा कि मुझे बेहद खुशी है कि मैं 1958-1960 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय का छात्र रहा हूँ। इस विश्वविद्यालय से जुड़ने का कोई मौक़ा आज भी नहीं छोड़ना चाहता। सुधीर चंद्रा जी गाँधी: एक असम्भव संभावना जैसी महत्वपूर्ण पुस्तक के लेखक हैं।
गाँधी पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि गाँधी की मृत्यु का मातम व्यापक था। यह भी कि गाँधी जी पर आधारित किसी आयोजन की सार्थकता गाँधी पर बड़ी-बड़ी बातों से नहीं होगी। गाँधी का कोई विचार यदि किसी को खटकता है, उस विचारों पर बात करने का ढोंग बंद करना होगा। गाँधी ने प्रकृति बचाने की बात की, हम प्रकृति को रौंद रहें हैं। प्रकृति के बजाय विज्ञान से मिल रहे शुद्ध हवा-पानी से संतुष्ट हो जा रहें हैं। गाँवों के अर्थतंत्र को नष्ट कर रहें हैं, साम्प्रदायिक उन्माद में शामिल हो रहें हैं और कहते हैं कि गाँधी के रास्ते पर चलना होगा,
गाँधी के बारे में बताते हुए कहा कि गाँधी ने अपने जीवन के अंतिम समय में कहा था, मैं 125 वर्ष जीने का आकांक्षी था, अब 100 भी नहीं जीना चाहता, भगवान मुझे अभी उठा लें। इस देश में ईश्वर का नाम लेकर काम राक्षसों का हो रहा है। दरअसल, सोचने की बात यह है कि ऐसा क्या था कि गाँधी आज़ाद देश में अपने जीने की इच्छा खो चुके थे, सुधीर जी ने श्रोताओं से आग्रह किया कि यदि संभव न हो तो ख़ुद को गाँधी मार्ग का सिपाही साबित न करें।
यह भी कहा कि आज गाँधी पर बात करने की बजाय उन्हें समझने की ज़रूरत है। गाँवों को केंद्रीय भूमिका में लाना होगा। जनतंत्र और राजतंत्र का फ़र्क समझना होगा। प्रकृति का संरक्षण करना ही होगा, इस ऑनलाइन व्याख्यान का संचालन हिंदी विभाग से डॉ. अमृता ने और तकनीकी सहयोग अनुवाद अधिकारी हरिओम कुमार और डॉ. धीरेंद्र प्रताप सिंह ‘धवल’ ने प्रदान किया। इस व्याख्यान में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कई वरिष्ठ शिक्षक और तमाम शोधार्थी एवं विद्यार्थी जुड़े रहे।
विशिष्ट अतिथि ने गाँधी मंडपम में रंगोली बनाने वाली इलाहाबाद विश्वविद्यालय की दो छात्राओं दिव्या और अनामिका को गाँधी जी के जीवन पर आधारित पुस्तकें भी भेंट की। इस दौरान संस्थान के निदेशक प्रो. संतोष भदौरिया, प्रो. धनंजय यादव, प्रो. एन. बी सिंह, प्रो. अजय जेटली, प्रो. शबनम हमीद, डॉ. अविनाश श्रीवास्तव, डॉ. राजेश सिंह, डॉ. अखिलेश पाल, डॉ. धीरेंद्र प्रताप सिंह ‘धवल’, डॉ. मृत्युंजय राव परमार सहित संस्थान के सभी कर्मचारी मौजूद रहे, इस अवसर पर संस्थान द्वारा गूगल मीट पर एक ऑनलाइन व्याख्यान भी आयोजित किया।
जिसमें स्वागत वक्तव्य प्रो. संतोष भदौरिया ने दिया। उद्घाटन वक्तव्य देते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. संगीता श्रीवास्तव ने कहा कि दक्षिण अफ़्रीका में गाँधी का व्यक्तिगत तिरस्कार सामाजिक संघर्ष बन गया था। गाँधी जी सदैव कालजयी व्यक्तित्व के रुप में जाने जाते रहेंगे। उन्होंने कहा कि गाँधी के सर्वोदय, सेवा, स्वदेशी और स्वच्छता के विचारों की निरंतरता ही आज़ादी के वास्तविक अर्थ को साकार करता रहेगा। अंतिम जन के लिए और अंतिम जन को भी अहिंसा,
अनुशासन और आत्मनिर्भरता को स्वीकार करना होगा, मुख्य वक्ता के तौर पर दिल्ली से प्रो. सुधीर चंद्रा ने ‘गाँधी की भारत संकल्पना’ विषय पर बड़ी ही बेबाकी से अपनी बात रखी। प्रो. सुधीर चंद्रा ने कहा कि मुझे बेहद खुशी है कि मैं 1958-1960 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय का छात्र रहा हूँ। इस विश्वविद्यालय से जुड़ने का कोई मौक़ा आज भी नहीं छोड़ना चाहता। सुधीर चंद्रा जी गाँधी: एक असम्भव संभावना जैसी महत्वपूर्ण पुस्तक के लेखक हैं।
गाँधी पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि गाँधी की मृत्यु का मातम व्यापक था। यह भी कि गाँधी जी पर आधारित किसी आयोजन की सार्थकता गाँधी पर बड़ी-बड़ी बातों से नहीं होगी। गाँधी का कोई विचार यदि किसी को खटकता है, उस विचारों पर बात करने का ढोंग बंद करना होगा। गाँधी ने प्रकृति बचाने की बात की, हम प्रकृति को रौंद रहें हैं। प्रकृति के बजाय विज्ञान से मिल रहे शुद्ध हवा-पानी से संतुष्ट हो जा रहें हैं। गाँवों के अर्थतंत्र को नष्ट कर रहें हैं, साम्प्रदायिक उन्माद में शामिल हो रहें हैं और कहते हैं कि गाँधी के रास्ते पर चलना होगा,
गाँधी के बारे में बताते हुए कहा कि गाँधी ने अपने जीवन के अंतिम समय में कहा था, मैं 125 वर्ष जीने का आकांक्षी था, अब 100 भी नहीं जीना चाहता, भगवान मुझे अभी उठा लें। इस देश में ईश्वर का नाम लेकर काम राक्षसों का हो रहा है। दरअसल, सोचने की बात यह है कि ऐसा क्या था कि गाँधी आज़ाद देश में अपने जीने की इच्छा खो चुके थे, सुधीर जी ने श्रोताओं से आग्रह किया कि यदि संभव न हो तो ख़ुद को गाँधी मार्ग का सिपाही साबित न करें।
यह भी कहा कि आज गाँधी पर बात करने की बजाय उन्हें समझने की ज़रूरत है। गाँवों को केंद्रीय भूमिका में लाना होगा। जनतंत्र और राजतंत्र का फ़र्क समझना होगा। प्रकृति का संरक्षण करना ही होगा, इस ऑनलाइन व्याख्यान का संचालन हिंदी विभाग से डॉ. अमृता ने और तकनीकी सहयोग अनुवाद अधिकारी हरिओम कुमार और डॉ. धीरेंद्र प्रताप सिंह ‘धवल’ ने प्रदान किया। इस व्याख्यान में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कई वरिष्ठ शिक्षक और तमाम शोधार्थी एवं विद्यार्थी जुड़े रहे।

